Loneliness

There is nothing in this empty poem

To keep you company.

Not that I did not try to innovate metaphors

So as to replete the void;

But all of them,

Without exception,

Were blown to smithereens –

The fragments disappearing into thin air.

First to go was a bird I’d sketched

Which flew off the page

Into the deep blue sky,

As if it were never there in the first place.

And even if you were to look at the sky now,

There is nothing but blue.

Next was adumbrated a Royal Bengal tiger

Which I had to run away from

Since it threatened to gobble me up.

And by the time I returned

To ascertain its motives

(for the safety of my readers),

It had eaten itself

To satiate the void.

Or did the void chugalug it!

One could never tell,

Even if one were the tiger.

Since then I have gone,

Hither and yon –

Emptiness is the only leitmotif  to be identified,

 Whatever we look at.

The discerning reader must’ve already realized –

Loneliness in fact, looks just like that.

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दीवार गिरा दो (बाहर कितना कुछ है)

जो छोटी सी पगडंडी

मन से होकर

मानस तक जाती है,

उसके रास्ते

अपने दिमाग में घुस जाओ !

वहाँ बेवजह ही तुमने

जो संकीर्ण दीवार बना रखी है,

उससे कान लगाकर सुनो –

बाहर एक झरना बह रहा है,

उसके पास एक दरख़्त पे

एक परिंदा है,

न जाने क्या कह रहा है !

उससे सुर मिलकर तो देखो

गीत कोई नया गा कर तो देखो !

कितना कुछ है,

उठो अब

ये दीवार गिरा दो;

तुम्हारे पास ही कोने में

एक हथौरा रखा है !

दौड़ो,

सामने खुला मैदान है,

जहाँ पहले ही तुम्हारे मन ने

अपना घोडा दौड़ा रखा है !

अनुसंधान करो

हर दिशा अनंत है,

मन में फूल खिलें हो

तो हर मौसम वसंत है !

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क्यूँ पूछती हो मैं कहाँ हूँ

मेरी ही आवाज़ का झोंका है

जो चुपचाप

तुम्हारी ज़ुल्फें छेड़  जाता है,

मेरी ही ज़ुबान का पानी है

जो दिन भर तुम्हारी जीभ पर

लटपटाता  है !

जो फैली है तुम्हारे इर्द-गिर्द –

मेरी साँसों में घुली

तुम्हारी साँसों की खुशबू है,

जो तुम्हारे अनचाहे

तुम्हारी आँखों में भर आता है

मेरी ही निगाह का आंसू है !

मेरी ही बाहें हैं

कड़ी ठण्ड में जिनसे तुम खुद को

लपेट लेती हो,

मेरे ही बिखरे सपने हैं

तुम्हारे बिस्तर पर,

हर सुबह जिन्हें तुम समेट लेती हो !

दूरियां तो बस मन की होती हैं;

मत कहना अब कभी

कि मैं नहीं हूँ,

ज़रा नज़र उठा के देखो

यहीं तुम्हारे पास,

यहीं हूँ !

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